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कोरोना से भयानक टिड्डी दल, जिससे चीन मे करोड़ो लोग मारे गए थे | पढिए पूरी स्टोरी, देखिए वीडियो |


दोस्तों आज के इस जानकारी में हम बात करेंगे एक ऐसी भयानक ऐतिहासिक इंसानी गलती की जिसकी वजह से ढाई करोड़ लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था | मनुष्य के द्वारा अनजाने में प्रकृति चक्कर से छेदछाड़ कितनी हानिकारक हो सकती है इसका नतीजा हमें 1958 में चीन में देखने को मिला था | दोस्त हम बात कर रहे है ऐसे अभियान की जिसका निर्णय बेहद ही गलत साबित हुआ और अंततः तबाही का कारण बना था | इस अभियान का नाम था द ग्रेट स्पेरो केंपेन (the great Sparrow campaign)  जिसमे मुख्य रूप से चार किट अभियान के नाम से भी जाना जाता है| इस अभियान की शुरुआत चाइना में 1958 में की गई थी| ये वही वर्ष था जब चाइना के पीपल्स रिपब्लिक के संस्थापक माओ जे़डोंग में फैसला किया की चाइना की अर्थव्यवस्था जो कि कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था थी को उन्नत करके औद्योगिक और आधुनिक अर्थव्यवस्था में परिवर्तित किया जाए |


      माओ जेडोंग जिन्हे माओ से तुंग के नाम से भी जाना जाता था| के बारे में आपको ता दें कि उन्हें चाइना में महान क्रांतिकारी, राजनीतिक रणनीतिकार, सैनिक एवं देश रक्षक के रूप में याद किया जाता है | पर दोस्तो गलतियां तो सभी से ही हो जाती है चाहे वह कितना बड़ा व्यक्तित्व या हंसती क्यों ना हो| माओ चाइना को विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाना चाहते थे| उस समय ग्रेट ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था सबसे उन्न्त थी | उसके बाद अमेरिका का नंबर आता था | माओ और उसके प्रतिनिधियों ने संकल्प लिया कि अब से शुरू करके आने वाले 15 सालों के भीतर हम अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पछाड़ कर यूके की अर्थव्यवस्था की बराबरी कर लेंगे | सब कुछ सही रहा तो चीन यूके को भी पछाड़ देगा | इस संकल्प के साथ चीन में एक बहुत बड़े आंदोलन की परिकल्पना की गई| जिसे द ग्रेट लीफ फॉरवर्ड का नाम दिया गया, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है "आगे की ओर एक महान छलांग" परंतु आने वाले समय को कुछ और ही मंजूर था और ये द ग्रेट लीफ फॉरवर्ड आंदोलन चाइना के इतिहास का बहुत बड़ा काला अध्याय साबित हुआ और करोड़ों लोगों को भूख से बिलखते हुए तब छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा |

       दरअसल माओ का मानना था कि चीन में परिवर्तन का राज उसके तेजी से बढ़ती आबादी में ही छिपा है और यदि इस बदती आबादी को व्यवस्थित तरीके से विकसित किया जाए तो सामाजिक और आर्थिक बदलाव देखे जा सकते हैं| इसके अलावा फसलों को आय का अच्छा श्रोत बनाया जा सकता है| इसके लिए कृषि भूमि पर अधिक उत्पादन की आवश्यकता थी और उत्पादकता बढ़ाने के लिए नई सरकारी नीतियों को जमीनी तौर पर लागू करने का फैसला किया गया| और शुरू किया गया एक विचित्र अभियान जो आखिरकार करोड़ों लोगों की मौत का कारण बना| इस अभियान का नाम था चार किट  अभियान और यह चार किट थे गोरैया, चूहे, मक्खी और मच्छर | माओ ने कहा कि चूहे मच्छर मक्खियां और चिड़िया ये सभी मानव के दुश्मन है और इन्हें मार देना चाहिए| उनका देश चिड़िया यानी गौरैया और बाकी के कीटों के बिना भी रह सकता है| चीनी वैज्ञानिकों ने गणना की थी कि प्रत्येक गोरैया हर साल 4.5 किलोग्राम अनाज या बीज खा जाती है और फले को भी नुकसान पहुचाती है| अगर गोरैया को मार दिया जाए तो जनता के लिए भोजन की उपलब्धता बढ़ जाएगी और बढ़े हुए उत्पादन को निर्यात किया जा सकता है|

      माओ ने इसी समस्या का निराकरण करने के लिए ग्रेट स्पेरो अभियान शुरू किया था  परंतु यह अभियान नहीं युद्ध था | उन चार कीटो के खिलाफ, चरो कीटो को खत्म करने के लिए आम लोगो से लेकर सेना तक का इस्तेमाल हुआ | सबसे ज्यादा फोकस किया गया बेचारी मासूम चिड़ियों पर| इस अभियान का व्यापक प्रचार और प्रसार किया गया| चीनी नागरिकों को गोरियों को मिटाने के लिए भारी तादाद में जुटाया गया| गोरैया विरोधी सेना बनाई गई, विद्यालयो, कारखानों, बाजारों में गौरैया मारने की मुहिम चलाई गई| जनता में प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए गए, सिर्फ मासूम चिड़िया को मारने के लिए | "गोरैया को मिटाना है, चीन को चमकाना है" यह इस अभियान का नारा भी था| चीनी लोग गोरैया को आतंकित करने के लिए, उन्हें जमीन पर उतरने से रोकने के लिए ढोल पीटते हुए उनका पीछा करते थे| ढोल की आवाज से डरी हुई ये मासूम चिड़िया जमीन पर नहीं उतरती थी और लगातार उड़ते रहती थी |

      चीनी लोग तब तक ढोलक बजाते रहते थे जब तक गोरैया उड़ते उड़ते थक कर गिर ना जाए और गिरते ही उसे मार दिया जाता था| चीनी लोगों ने गोरैया के घोसले तोड़ दिए, अंडे नष्ट कर दिए| यह अभियान तने तेज युद्ध स्तर पर शुरू किया गया कि पहले ही दिन करीब दो लाख से ज्यादा गोरैया को मार गिराया गया| चीनी लोग खुशी में मरी हुई गोरैया कि माला बनाते थे | चीनी जनता मे इस मासूम चिड़िया को जड़ से खत्म कर देने का एक पागलपन कि हद तक जुनून सवार था| इसके पीछे का कारण था कि चीन की अर्थव्यवस्था को अमेरिका से भी आगे लेकर जाना है| लगातार इस तरह के प्रयासों के परिणाम स्वरुप 2 साल के अंदर ही चीन में गोरैया की प्रजाति लगभग विलुप्त हो ग| लेकिन चीन के लोग सिर्फ यही नहीं रुके अभियान के इस पागलपन में लोगों ने गोरैया के अलावा अन्य पक्षियों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया| जिससे पूरे चीज में लगभग सभी पक्षियों की प्रजाति ही लुप्त होने के कगार पर आ खड़ी हुई |

      दोस्तो इस ग्रेट स्पेरो अभियान को तो 1960 टीके सफलता मिल गयी थी परंतु एक प्रत्येक महाकाल समस्या धीरे-धीरे चीन में आ रही थी और वो थे भयंकर पर्यावरण असंतुलन की| दोस्तों गोरैया जैसी कोई भी चिड़िया केवल अनाज या बीज ही नहीं खाती, गोरैया कीड़े मकोड़े भी खाती है| जिससे कीड़े मकोड़ों की संख्या नियंत्रण में रहती है और चूंकि अब उन कीड़े मकोड़ो को खाने वाली चिड़ियाओ को चीनी लोगों ने मार डाला था| तो अब ऐसे में सभी कीड़े मकोड़ों और छोटे कीटो की आबादी में एसा उफान सा आया जो थमने का नाम ही नहीं ले रहा था | सबसे ज्यादा बढ़ोतरी हुई टिड्डियों की संख्या में, पूरे चीन में टिड्डियों की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई| टिड्डी दल झुंड के झुंड में आते और चंद ही घंटों में हजारों हेक्टेयर में फैली फसलों को चट कर जाते| टिड्डी दल का ऐसा भयंकर हमला चीन वासियो ने पहले कभी नहीं देखा था| टिड्डी दल रातो रात किसी गांव पर हमला करते और पूरे गांव की फसल को एक ही रात में तबाह करके अगले गांव की ओर प्रस्थान करते थे| वहीं चीनी बड़े बेबस से खड़े होकर यह सब देखते ही रह जाते| करोड़ों की संख्या में एक साथ हमला करते इन टिड्डी दलो को काबू करने मे कोई भी तरीका कारगर साबित नहीं हो रहा था| टिड्डी दलो आक्रमण और फसलों को खाने वाले अन्य कीट पतंगों के हमले के कारण चीन में पैदावार बुरी तरह से प्रभावित हुई| लगातार कीटनाशक के छिड़काव भी और चीनी सरकार के द्वारा अपनाए गए अन्य उपाय भी इन कीटो की बढ़ती संख्या के आगे बेअसर साबित हुए| उल्टा नए नए कीटनाशकों के प्रयोग ने फसलों को और भी ज्यादा ढ़ा दिया था|

      देखते ही देखते चाइना में अकाल की स्थिति आ गई जनता अन्न को तरसने लगी और पूरे चीन मे भुखमरी के हालात हो गए| यह पता लगने पर कि गौरैया और अन्य पक्षी कीड़े मकोड़ों को खाकर पर्यावरण संतुलित रखने में अपना योगदान देते हैं | माओ ने 1960 में गौरैया मारने का अभियान स्थगित कर दिया| लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी पर्यावरण संतुलन अपना काम कर चुका था| अकाल के कारण करोड़ों लोग खाने को तरस तरस कर मर गए| 1058 से 1961 के 3 सालों में चीन में 30 मिलियन यानि 3 करोड़ लोग मारे गए थे| बेशक चीनी सरकार ने मरने वालों की आधिकारिक संख्या 15 मिलियन बताई थी| लेकिन कुछ विद्वानो का अनुमान था कि भूख से मरने वालों की संख्या 45 मिलियन याने 4.5 करोड़ तक थी | इस घटना चाइना के इतिहास में महान अकाल के नाम से जाना जाता है| चीनी पत्रकार योंग जिसेंग जो 1940 मे पैदा हुए थे, उन्होंने चाइना के इस अकाल को अपनी पुस्तक टोंबस्टोन मे विस्तृत तरीके से कवर किया है और उनके मुताबिक 36 मिलियन ज्ञानी 3.6 करोड़ लोग मारे गए| थे यह पुस्तक आज चाइना में प्रतिबंधित है महान अकाल के रूप में याद रखे जाने वाला यह विषय चीन में अब 60 वर्षों के बाद भी वर्जित बना हुआ है| इतना ही नहीं चीन के आधिकारिक रिकॉर्ड बताते हैं कि यह प्राकृतिक आपदा थी, ना कि सरकारी कुप्रबंध और गलत नीतियों का परिणाम| जबकि वास्तव में यह घटना एक भयंकर मानवीय भूल थी, जिसकी वजह से करोड़ों लोग भूख की वजह से मारे गए थे|

      तो दोस्तों अंत में यही कहूंगा कि यह एक पर्यावरण के प्रति मानवीय भूल थी और एक  ऐसी राजनीति कुप्रबंध कि अनौकी दास्तान थी जो एक एसी ऐतिहासिक गलती बनी जिसकि कीमत आम जनता के करोड़ो लोगों को अपनी जान दे कर चुकानी पड़ी | हमे इस ऐतिहासिक घटना से सबक लेना चाहिए क्योकि इतिहास के बारे मे कहा जाता है कि इतिहास से सबक नहीं लिया जाता तो इतिहास खुद को दोहराता है |


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