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कान्ह के गंदेे पानी से शिप्रा का रंग काला, हरा, अब हल्का लाल हुआ

मोक्षदायिनी कही जाने वाली शिप्रा नदी में जिम्मेदारों की लापरवाही के कारण एक बार फिर से नदी का पानी प्रदूषित हो गया। कान्ह नदी के केमिकल युक्त पानी को रोकने के लिए त्रिवेणी पर बनाए गए अस्थाई पुल के टूटने के बाद इंदौर के औद्योगिक क्षेत्र और नालों से आने वाला गंदा पानी मिलने से शिप्रा नदी में बढ़े प्रदूषण के कारण नदी के पानी का रंग ही बदल गया है।


पिछले 5-7 दिनों के भीतर नदी में प्रदूषण इतनी तेजी से फैला कि नदी के पानी का रंग काला और हल्का लाल हो चुका है। जिसके कारण नदी के भीतर रहने वाले जीवों को भी ऑक्सीजन की कमी होने लगी है। जिससे मछलियां, कछुए व अन्य जलीय जीव दम घुटने से मर रहे हैं। त्रिवेणी के समीप कान्ह नदी से आने वाले प्रदूषित पानी को रोकने के लिए अस्थाई डैम बनाया था, जो करीब 15 दिन पहले टूट चुका है। कान्ह नदी के प्रदूषित पानी के ट्रीटमेंट के सारे दावे भी शिप्रा की मौजूदा स्थिति के सामने खोखले साबित हो रहे हैं। इंदौर के औद्योगिक क्षेत्र से केमिकल वाला गंदा पानी कान्ह नदी के जरिए शिप्रा नदी में आकर मिलता है।


अधीक्षण यंत्री (पीएचई) धर्मेंद्र वर्मा ने बताया कुछ दिन पहले से कान्ह नदी का पानी तेजी से आया है। शनि मंदिर के पास बने अस्थाई डैम के टूटने के कारण और ओवर फ्लो होने के कारण पानी को आगे निकालने के लिए गऊघाट पर गेट खोला गया है। डायवर्सन का काम केवल ड्राई सीजन के लिए ही होता है। बारिश में 15 जून के बाद इस पानी को आगे बढ़ने के लिए छोड़ा जाता है।

खुजली और त्वचा संबंधी परेशानियां
गऊघाट पक्का पाला के समीप रहने वाले धर्मेंद्र भाट और घनश्याम केवट ने बताया 5-7 दिनों के भीतर नदी के पानी का रंग बदल गया है। हम आए दिन नदी में स्नान करते थे। पानी गंदा होने के कारण पिछले चार-पांच दिन से खुजली चलने, शरीर पर दाने पड़ने जैसी परेशानियां हो रही है। जिसके कारण पिछले दो-तीन दिनों से नदी में नहाना बंद कर दिया है।


गऊघाट पर खुला हुआ है एक गेट
कान्ह नदी का पानी आने के कारण गऊघाट पक्का पाला पर एक गेट शुक्रवार शाम तक भी साढ़े 3 फीट तक खुला रखा गया। ताकि यह पानी आगे निकल सके। कुल 19 फीट की क्षमता वाले गऊघाट पर शुक्रवार शाम तक 8 फीट 7 इंच पानी था।

पर्यावरणविद् बोले- रंग बदलने के साथ पानी बताता है प्रदूषण

पर्यावरणविद एवं विक्रम विश्वविद्यालय की पर्यावरण प्रबंध अध्ययनशाला के विभागाध्यक्ष डॉ. डीएम कुमावत ने बताया आमतौर पर नदियों में जहां बहता पानी होता है वहां आकाश के रिफ्लेक्शन से उसका रंग हल्का नीला दिखाई देता है। वहीं जिन नदियों के भीतर पत्थरों के नीचे शेवाल (काई) पैदा हो जाती है तो उस नदी का पानी हल्का हरा हो जाता है। पानी में न्यूट्रिएंट्स जैसे साबुन का पानी या कोई अन्य दूषित पानी आकर मिलता है तो पानी का रंग गहरा हरा दिखाई देने लगता है। शिप्रा नदी में आमतौर पर इसी तरह के गहरे हरे रंग का पानी दिखाई देता है। वहीं जब-जब केमिकल युक्त पानी का रंग काला, हल्का लाल या ब्राउन होने लगता है तो इसका अर्थ यह है कि उसमें ज्यादा केमिकल वाला दूषित पानी आकर मिल रहा है। केमिकल का पानी नदी में मिलने से नदी के पानी में केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) बढ़ जाती है और ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। जिसके कारण पानी में रहने वाले जीवों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और वह दम घुटने के कारण पानी में ही दम तोड़ देते हैं। इंसान जब भी इस केमिकल युक्त प्रदूषित पानी के संपर्क में आते हैं तो उन्हें चर्म रोग, खुजली, बालों में इंफेक्शन, कानों में फंगस, आंखों में जलन होने जैसी शिकायतें आना शुरू हो जाती है। पानी नाक या मुंह के जरिए पेट में जाने पर पेट के विकार और डायरिया आदि होने की भी समस्या इससे होती है।



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