वर्तमान में सम्पूर्ण सृष्टि इस भयावह कोविड 19 से जूझ रही है। गत वर्ष अक्टूबर माह में कोरोना का ग्राफ़ गिरने के बाद जब मित्रों ने समारोहपूर्वक मास्क का परित्याग कर दिया, तो मैं दो मास्क लगाने लगा। दो इसलिए कि एक मास्क से ऐनक पर भाप जम जाती थी, दो से सहूलियत रहती थी- अलबत्ता इसके पीछे का वैपराइज़ेशन वाला विज्ञान मुझको मालूम नहीं। किंतु मेरी खिल्ली उड़ाई गई। यारों ने कहा, अब भी मास्क लगा रहे हो, कोरोना तो चला गया ना? मैंने कहा, क्या कोरोना ने अधिकृत सूचना दी है कि अब मैं जा रहा हूँ? उन्होंने कहा, नहीं वैसा तो नहीं है, पर इतना क्यों डरते हो? मैंने कहा, जीवन में मेरा तजुर्बा यह है कि हमें अपनी बदक़िस्मती पर कभी भी शक नहीं करना चाहिए, उसको हलके में नहीं लेना चाहिए।
मर्फ़ीज़ लॉ यही तो कहता है- हर वो चीज़ जो ग़लत हो सकती है, मान लीजिए कि होकर रहेगी। अप्रैल से सितम्बर तक भारत में कोरोना का ग्राफ़ एक सीध में बढ़ता रहा था। कर्व बेंड नहीं हो पाया था। फिर सितम्बर से गिरावट शुरू हुई। इस अवधि में यूरोप में कोराना ने कुछ दिन छुट्टी मनाई थी, अक्टूबर के ही आसपास वो यूरोप में फिर लौटने लगा- इटली, यूके, फ्रांस, जर्मनी में आपात-स्थितियाँ बनने लगीं। इस पैटर्न को देखकर कोई भी अनुमान लगा सकता था कि यह वायरस आगे बढ़ता है, फिर पीछे लौटता है, और फिर पलटवार करता है। इसने लड़ाई के अंत की घोषणा अभी नहीं की है। जब दुनिया में हंड्रेड परसेंट वैक्सीनेशन हो जाएगा, तब तस्वीर देखी जाएगी कि यह क्या रूप दिखलाता है। तब तक स्टेटस-को ही है, यानी 12 मार्च 2020 को डब्ल्यूएचओ के द्वारा पैन्डेमिक की अधिकृत घोषणा के बाद वाली यथास्थिति तभी से बरक़रार है, उसमें कोई बदलाव नहीं आया है।
किंतु लगभग सबने मान लिया कि अब यह चला गया- जैसे कोई जादू। इसको ख़ुशफ़हमी कहते हैं। मेरे एक विद्वान मित्र ने मुझको एंटीबॉडी पर बहुत ज्ञान दिया कि कैसे अब सबमें एंटीबॉडीज़ बन चुकी हैं और हर्ड इम्युनिटी आ गई है। किसी ने कहा, कोरोना कभी था ही नहीं, यह एक अफ़वाह मात्र थी। जैसे फ़्लैट-अर्थर्स होते हैं, धरती को समतल समझने वाले, वैसे ही वे भी थे। मैंने देखा कि मेले लगे, शादियाँ हुईं, बरातें निकलीं, त्योहार मनाए गए, रैलियाँ और शोभायात्राएँ निकलीं- और मास्क कहीं भी नहीं था। हैंड सैनिटाइज़र दुर्लभ होता चला गया। ना किसी ने खाँसने-खँखारने से तौबा की, ना थूकने-पीकने से। सबसे ज़्यादा अचरज पानीपूरी के ठेलों पर जमा भीड़ को देखकर हुआ। किसी ने नक़ाब नहीं लगाया था। महिला-पुरुषों के साथ छोटे बच्चे भी मौजूद थे, तश्तरियों में रस उड़ेला जा रहा था, चटखारे चल रहे थे। भारत उत्सवप्रिय और सुखवादी है। तौबा-परहेज़ से जी नहीं सकता।
मार्च के पूर्वार्द्ध तक भारत में कोरोना के आंकड़े पिछले दिन से बेहतर ही बरामद होते रहे थे। फिर उसने धीरे-धीरे फन उठाना शुरू किया। महज़ एक पखवाड़े में उसने फिर से गए साल अगस्त-सितम्बर वाली स्थिति में ला दिया है और बीते साल के तमाम बुरे शब्द फिर लौटकर आने लगे हैं। महामारियाँ वैसा ही धूप-छाँव का खेल खेलती हैं, एक बार में मुकम्मल ख़त्म नहीं होतीं, लेकिन जिन्होंने पूरे समय ऐहतियात बरती, अगर आज वो पूछें कि हमारा क्या दोष था, जो हमें फिर से इन हालात का सामना करने पर विवश होना पड़ रहा है, तो इसका कोई उत्तर उन्हें मिलने वाला नहीं है। मनुष्य सामाजिक जंतु है और समूह में रहता है। समूह में की गई चीज़ों का अच्छा और बुरा- दोनों ही तरह का फल व्यक्ति भोगता ही है। इससे कोई बचाव मुमकिन नहीं।
अक्टूबर के बाद से की गई आपराधिक लापरवाहियों के चित्र मेरी आँखों के सामने घूम रहे हैं, किंतु मैं चकित नहीं हूँ। मैंने अपना पूरा जीवन इसी देश में बिताया है, कहीं और रहा नहीं हूँ और मेरा कड़वा तजुर्बा यह है कि इस देश में सामान्य बुद्धि और विवेक का सूचकांक अत्यंत शोचनीय दशा में है। पूरी दुनिया में यही आलम हो या इससे भी बदतर हों, तो मुझको मालूम नहीं, किंतु यहाँ की बात तो शर्तिया बतला सकता हूँ। कोई मरता हो मरे मुझे इससे क्या- ये यहाँ की मूल-भावना मालूम होती है। कोई भी अपनी छोटी-सी स्वार्थपूर्ति के लिए किसी और का जीवन मज़े से दाँव पर लगा सकता है, बिना किसी पछतावे के। भारत में जब भगदड़ होती है तो कोई कुचलता हो तो कुचले मुझे इससे क्या वाली भावना बलवती हो जाती है। यहाँ भीड़ को अनुशासित करना लगभग असम्भव है, क्योंकि अनुशासन या तो एक क्रूर व्यवस्था आप पर ऊपर से लादती है, या आप स्वयं इसे अपनी विचारशीलता से विकसित करते हैं। दूसरी वाली बात की अपेक्षा करना तो ख़ैर अति होगी। और पहली वाली चीज़ लोकतंत्र की मुखापेक्षी है। भारत में लोकतंत्र का अर्थ मनमानी करने की छूट है।
जैसे पहली लहर आई थी और चली गई थी, यह भी आकर जाएगी, और बहुत मुमकिन है वैक्सीनेशन-ड्राइव और हर्ड इम्युनिटी के कारण यह पहले से कम जान का नुक़सान पहुँचाए, लेकिन इससे जिनको निजी क्षतियाँ होंगी- चाहे आर्थिक हों, चिकित्सकीय हों, या मनोवैज्ञानिक हों- उसकी कोई सुनवाई नहीं होने वाली है। कोरोना-वायरस ने दूसरी तमाम चीज़ों के साथ ही भारत के राष्ट्रीय-चरित्र की भी ख़ूब परीक्षा ली है, इसके विरोधाभासों और दुविधाओं को उजागर किया है। अलबत्ता परिणामों ने शायद ही किसी मेधावी को चौंकाया होगा, शायद थोड़ी और उदासी से भले भर दिया हो।
प्रफुल्ल सिंह "बेचैन कलम"
युवा लेखक/स्तंभकार/साहित्यकार
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
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