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Eid-ul-Adha : जानें आखिर क्यों मनाया जाता है बकरीद का त्योहार, क्या है कुर्बानी का मतलब


हमदर्द न्यूज स्टोरी: बकरीद (Eid-ul-Adha 2020) जिसका मतलब है कुर्बानी की ईदइस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले लोगों का एक प्रमुख त्यौहार हैरमजान के पवित्र महीने की समाप्ति के लगभग 70 दिनों बाद इसे मनाया जाता है. इस्लाम मजहब की मान्यता के अनुसार, कहा जाता है अल्लाह ने हजरत इब्राहिम से सपने में उनकी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी मांगी थी. हजरत इब्राहिम अपने बेटे से बहुत प्यार करते थे, लिहाजा उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देने का फैसला किया. अल्लाह के हुक्म की फरमानी करते हुए हजरत इब्राहिम ने जैसे ही अपने बेटे की कुर्बानी देनी चाही तो अल्लाह ने एक बकरे की कुर्बानी दिलवा दी. कहते हैं तभी से बकरीद का त्योहार मनाया जाने लगा।

बकरीद का त्यौहार हिजरी के आखिरी महीने जुल हिज्ज में मनाया जाता है. पूरी दुनिया के मुसलमान इस महीने में मक्का सऊदी अरब में एकत्रित होकर हज मनाते है. ईद उल अजहा भी इसी दिन मनाई जाती है. वास्तव में यह हज की एक अंशीय अदायगी और मुसलमानों के भाव का दिन है. दुनिया भर के मुसलमानों का एक समूह मक्का में हज करता है बाकी मुसलमानों के अंतरराष्ट्रीय भाव का दिन बन जाता है.

बकरीद की कहानी इतिहास व ईद उल जुहा किसकी याद में मनाया जाता है  ( Bakrid festival History):

इस इस्लामिक त्यौहार के पीछे एक एतिहासिक तथ्य छिपा हुआ हैं जिसमे कुर्बानी की ऐसी दास्तान हैं जिसे सुनकर ही दिल कांप जाता हैं. बात उन हजरत इब्राहीम की हैं जिन्हें अल्लाह का बंदा माना जाता हैं, जिनकी इबादत पैगम्बर के तौर पर की जाती हैं| जिन्हें हर एक इस्लामिक द्वारा अल्लाह का दर्जा प्राप्त हैं, जिसे इस औदे से नवाज़ा गया उस शख्स का खुद खुदा ने इम्तहान लिया था.

बात कुछ ऐसी हैं : खुदा ने हजरत मुहम्मद साहब का इम्तिहान लेने के लिए उन्हें यह आदेश दिया कि वे तब ही प्रसन्न होंगे, जब हज़रत अपने बेइंतहा अज़ीज़ को अल्लाह के सामने कुर्बान करेंगे. तब हज़रत इब्राहीम ने कुछ देर सोच कर निर्णय लिया और अपने अज़ीज़ को कुर्बान करने का तय किया. सबने यह जानना चाहा कि वो क्या चीज़ हैं जो हज़रत इब्राहीम को सबसे चहेती हैं जिसे वो आज कुर्बान करने वाले हैं. तब उन्हें पता चला कि वो अनमोल चीज़ उनका बेटा हजरत इस्माइल हैं जिसे वो आज अल्लाह के लिए कुर्बान करने जा रहे हैं. यह जानकर सभी भौंचके से रह गये. कुर्बानी का समय करीब आ गया. बेटे को इसके लिए तैयार किया गया, लेकिन इतना आसान न था| इस कुर्बानी को अदा करना इसलिए हज़रत इब्राहीम ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली और अपने बेटे की कुर्बानी दी. जब उन्होंने आँखों पर से पट्टी हटाई तब अपने बेटे को सुरक्षित देखा. उसकी जगह इब्राहीम के अज़ीज़ बकरे की कुर्बानी अल्लाह ने कुबूल की. हज़रत इब्राहीम के कुर्बानी के इस जस्बे से खुश होकर अल्लाह ने उसके बच्चे की जान बक्श दी और उसकी जगह बकरे की कुर्बानी को कुबूल किया गया.

तब ही से कुर्बानी का यह मंज़र चला आ रहा हैं जिसे बकरीद ईद-उल-जुहा के नाम से दुनियाँ जानती हैं.

बकरीद का सच :

इसके आलावा इस्लाम में हज करना जिंदगी का सबसे जरुरी भाग माना जाता हैं. जब वे हज करके लौटते हैं तब Bakrid पर अपने अज़ीज़ की कुर्बानी देना भी इस्लामिक धर्म का एक जरुरी हिस्सा हैं जिसके लिए एक बकरे को पाला जाता हैं. दिन रात उसका ख्याल रखा जाता हैं. ऐसे में उस बकरे से भावनाओं का जुड़ना आम बात हैं. कुछ समय बाद बकरीद के दिन उस बकरे की कुर्बानी दी जाती हैं. ना चाहकर भी हर एक इस्लामिक का उस बकरे से एक नाता हो जाता हैं फिर उसे कुर्बान करना बहुत कठिन हो जाता हैं. इस्लामिक धर्म के अनुसार इससे कुर्बान हो जाने की भावना बढती हैं. इसलिए इस तरह का रिवाज़ चला आ रहा हैं.

इन जानवरों की दी जाती है कुर्बानी

बकरीद के दिन मुस्लिम बकरा, भेड़, ऊंट जैसे किसी जानवर की कुर्बानी देते हैं. इसमें उस पशु की कुर्बानी नहीं दी जा सकती है जिसके शरीर का कोई हिस्सा टूटा हुआ हो, भैंगापन हो या जानवर बीमार हो बकरीद के दिन कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटा जाता है. एक खुद के लिए, दूसरा सगे-संबंधियों के लिए और तीसरे हिस्से को गरीब लोगों में बांटे जाता है.

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