‘‘पीएम की गुगली’’ ! ‘‘सीएम हिट विकेट"
लेख का सारः-
प्रश्न यह है कि क्या यह एक ‘‘संवैधानिक समस्या’’ है अथवा ‘‘शिष्टाचार प्रोटोकाल की समस्या’’ है या ‘‘राजनीतिक’’ रुप से उत्पन्न की गई समस्या है।
देश की राजनीति में जब से मोदी वर्सेस ममता की धारणा ‘विकसित’ हुई है, तब से ‘‘पीएम वर्सेस सीएम’’ पश्चिम बंगाल की राजनीति का एक स्थायी घटना (फिनोमेनन) बनते जा रही है, ऐसा लगता है। ताजा घटना प्रधानमंत्री के पश्चिम बंगाल में आए चक्रवाती ‘‘यास’’ तूफान से ग्रस्त प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के तत्पश्चात हुये नुकसान पर चर्चा हेतु प्रधानमंत्री द्वारा मुख्यमंत्री एवं पश्चिम बंगाल सरकार व अधिकारियों से चर्चा करने हेतु समीक्षा बैठक बुलाई गई थी। प्रधानमंत्री द्वारा कलाई कुंडा स्थित वायुसेना के अड्ढे पर आयोजित बैठक में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उपस्थित नहीं हुई। आधे घंटे देरी (जिसका स्पष्टीकरण बाद में दिया गया कि हेलीकॉप्टर की अनुमति देरी से मिलना से हुई) से वे बैठक स्थल पर पहंुची व प्रधानमंत्री से 15 मिनट अलग से मिलकर ली बंगाल के लिए बीस हजार करोड़ रूपये के राहत पैकेज के संबंध में दस्तावेजों सहित एक रिपोर्ट सौंपी। फिर वे अनुमति लेकर दीधा के लिये रवाना हो गई। तत्पश्चात आरोप-प्रत्यारोप का दौर चालू हो गया। ममता पर प्रोटोकॉल उल्लघंन का आरोप लगा। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इसे संवैधानिक मर्यादा और सहकारी संघवाद की संस्कृति की हत्या बताया। इसी बीच पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव अलपन बंधोपाध्याय को प्रति नियुक्ति पर केंद्रीय सरकार ने दिल्ली वापस बुला लिया जिन्हे केंद्र सरकार ने एक हफ्ते पूर्व ही पश्चिम बंगाल सरकार आग्रह पर कोविड आपदाकाल को देखते हुये सेवा वृद्धि दी थी। इसके प्रत्युत्तर में बंधोपाध्याय ने एक्टेंशन स्वीकार न कर सेवानिवृत्ति ले ली और तब ममता ने उन्हें अपना मुख्य सलाहकार नियुक्त कर दिया।
प्रश्न यह है कि क्या यह एक ‘‘संवैधानिक समस्या’’ है अथवा ‘‘शिष्टाचार प्रोटोकाल की समस्या’’ है या ‘‘राजनीतिक’’ रुप से उत्पन्न की गई समस्या है। इस पर आगे चर्चा करें इसके पूर्व ममता के स्वभाव को जान लेना आवश्यक है। हम सबने देखा है, ममता ‘‘दीदी‘‘ कम ‘‘शेरनी‘‘ ज्यादा है। तेज तर्रार, तुनुक मिजाज, गुस्सैल, अभिमानी, न झुकने वाली व अनप्रिडिक्टेबल (अप्रत्याशित) महिला नेत्री है। इतने सब ‘‘गुणों’’ के साथ उनका सबसे महत्वपूर्ण गुण जो है, वह उनका आत्मबल, साहस (जो दुस्साहस की सीमा तक जाने में गुरेज नहीं करती है) दृढ़ निश्चय और अपने विपक्षियों को हमेशा करारा जवाब देने वाला ‘‘बॉडी लैंग्वेज‘‘ है। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी कमी बच्चों समान चिढ़ना है। इसलिए प्रधानमंत्री को जब भी चिढ़ाने का मौका मिलता है, वे भरपूर उसका उपयोग करते है। पश्चिम बंगाल के दो महीने के लम्बे चुनाव प्रचार की अवधि के दौरान हम सबने यह देखा है। ‘‘दीदी ओ दीदी‘‘ की आपके कानों में गूंजती आवाज अभी तक शायद खत्म नहीं हुई होगी?
ममता की इसी कमजोरी का फायदा उठाकर मोदी जी ने यास तूफान से हुई नुकसान पर चर्चा के लिए बुलाई गई पीएम एवं सीएम के बीच सामान्यता आमने सामने होने वाली सीधी बैठक में राज्यपाल व विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी को भी मीटिंग का बुलावा भेज कर ‘‘गुगली‘‘ फेंक दी। जिसके जाल में वे फँस गई। बंगाल पहंुचने के पूर्व प्रधानमंत्री उसी दिन सुबह पहिले तूफान ग्रस्त ओडिशा के दौरे पर पहंुचे थे। परन्तु वहाँ पर यह ‘‘गुगली‘‘ नहीं फेकी गई। (अर्थात ओडिशा में विपक्षी नेता को नहीं बुलाया गया प्रत्यारोत ममता ने लगाया है।) क्योंकि एक तो वहां के मुख्यमंत्री में स्वभाव दोष नहीं था। दूसरा उनके एनडीए से बेहतर संबंध है। यही तो राजनीति है। परंतु ममता इस गुगली के चक्कर में फस गई और पश्चिम बंगाल के हितों की रक्षार्थ बैठक में शामिल होने के बजाय न पहुंचकर हिट विकेट आउट हो गई। यदि ममता दिमागी संतुलन बनाए रख कर शुभेंदु अधिकारी की उपस्थिति में (भविष्य में विधान सभा में तो उनको सामना करना ही पड़ेगा) ही प्रधानमंत्री से मीटिंग कर राज्य के लिये आर्थिक पैकेज के लिए माँग करती तो निश्चित रूप से प्रधानमंत्री पर नैतिक दबाव ज्यादा बढ़ जाता। क्योंकि तब ममता को यह कहने का अवसर मिल जाता कि राज्य के तथाकथित शुभचिंतक पोषक राज्यपाल और बंगाल के ‘‘हितेषी‘‘ विपक्ष के नाते शुभेंदु अधिकारी की उपस्थिति में मांगे गए आर्थिक पैकेज को केंद्रीय सरकार द्वारा पूरा नहीं करना, उनके राजनीतिक प्रतिशोध को दिखाता है। और यही उनकी राजनीतिक रूप से विजय भी होती तथा वे जनता के दिलों में उनके हितों के लिए शेरनी समान लड़ती हुई भी दिखती। परंतु स्वभाव दोष ने यह अवसर उनके हाथ से छीन लिया।
मोदी-ममता के बीज हो रही इस रसाकस्सी ने "संघ व राज्य' के बीच प्रोटोकॉल व उनके संवैधानिक अधिकारों पर एक बार पुनः बहस छिड़ गयी है। इसका स्थायी हल निकालना देश के हित में आवश्यक है। संविधान ने केंद्र व राज्यों के अधिकारों व कर्त्तव्यों की स्पष्ट लक्ष्मण रेखा खींचे जाने के बावजूद यह विवाद सिर्फ बंगाल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पूर्व में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन व स्वयं नरेन्द्र मोदी जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे, के समय उत्पन्न हो चुका है। इन विवादों ने एक बार पुनः यह सिद्ध कर दिया है कि संवैधानिक व वैधानिक प्रावधान कर दिये जाने से मात्र ही समस्या का निराकरण नहीं हो जाता है। बल्कि इसके लिये उसे लागू करने की नीति व नियति की भी उतनी ही आवश्यकता है जिसकी कमी वर्तमान में बार-बार परिलक्षित हो रही है।
राजीव खण्डेलवाल
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार)
Email Id:- rajeevak2@gmail.com
Blog :- www.aandolan.com
"PM's googly"! "CM Hit Wicket" - Rajeev Khandelwal (Senior Writer) national issue west bengal.

