उतर रहा प्रावृष का विभव धीरे-धीरे
विटप-राशि भीजती जाती। उत्संग में सो रहा
मेरा मस्तक बार-बार गवाक्ष की ओर देखता।
मेघों की अतिशयता
इन अभिनील आँखों के आगे क्या ? चपला की चमक भी फीकी।
विविधवर्णी व्योम मन का सहोदर जान पड़ता
कि मैं खींच कर उस कोमल देह को बाहुपाश में भर लेता।
निदाघ से छूटा स्वेद।
घुलकर वर्षाकणों में नमक बन जाए तो कैसा अचरज।
पृष्ठभाग पर चुभते नख। मेरे गत्वर हाथों ने खोला
जूड़ा और उसके केश मेरे आधे तन पर बिछ गये।
सारङ्ग स्वर से धूजती धरा। पँछी उड़ते।
हमारे भीतर एक प्रकम्पन ठहर जाता। कभी वह मेरी
आँखों पर अपनी तनु हथेलियाँ धर देती।
कभी अपने उरोजों में छुपा लेती मुझे।
सोचता हूँ - उटज एक पाषाण को पूरा भीगने नहीं देता।
कमरा कौन संसार है; जो बात बनाएगा
उघड़ते रहे काम-द्वार। उतरते रहे
अंशुक एक एक कर।
लौट आयी वह, लेकिन भूली नहीं
कि सिरहाने से लेकर पैताने की दूरी
मेरे पराक्रम के हाँफने की कहानी भर है।
अधरों पर स्मिति बिखेरती। वह प्रेम उदधि में आकंठ निमज्जित। मेरे बालों में बहुत देर तक हाथ फिराती रहती।
प्रफुल्ल सिंह "बेचैन कलम"
युवा लेखक/स्तंभकार/साहित्यकार
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
सचलभाष/व्हाट्सअप : 6392189466
ईमेल : prafulsingh90@gmail.com
On Jyeshtha Krishna Ashtami, read the new article of young writer Praful Singh "restless pen".

