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संपूर्ण नागरिक बनने की प्रक्रिया, सवालों से शुरू होकर विद्रोह पर खत्म होती है - स्वतंत्र लेखक "मनीष अहिरवार"

The process of becoming a complete citizen, starting with questions and ending with rebellion - Freelance writer Manish Ahirwar




मौजूदा दौर में देश में दो तरह के नागरिकों का चलन बेतहाशा बढ़ा है। पहला चमचापन एवं दूसरा अंधभक्तपन। और इन दोनों ही तरह के नागरिकों का सम्बंध किसी न किसी राजनैतिक दलों से है। इनकी अपनी कोई विचारधारा नहीं है। क्योंकि इन्होंने अपनी विचारधारा का विलय अपनी पार्टी की विचारधारा में तब्दील कर लिया है। जिसकी वजह से इनकी सामाजिक और नागरिक स्वतंत्रता महत्वहीन हो गई है। इसी वजह से आज इनकी सामाजिक और नागरिक स्वतंत्रता राजनेताओं की गद्दी को सुभोषित कर रही है। इन नागरिकों की स्वतंत्रता राजनेताओं के कदमों में पड़ी है। फिर राजनेता भी अपने हिसाब से इनकी स्वतंत्रता का इस्तेमाल अपनी महत्वकांक्षा पूरी करने में कर रहे हैं। इन दोनों (चमचे और अंधभक्त) नागरिकों की कहानी एक ही जैसी है। दोनों के दिन की शुरुआत मानसिक गुलामी से शुरू होती है। सुबह होती ही अंधभक्तों की इज्जत जमीन पर बिखरी हुई होती है, हाथ सलामी ठोंक रहे होते हैं और सिर आका की गुलामी में झुका हुआ होता है। कमोबेश यही हाल चमचों का भी रहता है। 
ये दोनों ही प्रकार के नागरिक देश के लिए शुभ नहीं हो सकते। क्योंकि इनमें असत्य के प्रति विद्रोह करने की क्षमता नहीं होती है। ये सदैव अपनी दासता औरस मूर्खता का परचम लहराने में मग्न रहते हैं। इनका एक ही लक्ष्य रहता है बस अपने नेता को सर्वश्रेष्ठ बताना उसी का प्रचार प्रसार करना। बाकी दूसरे नेताओं की मीम बनाकर उन्हें बदनाम करना। भले ही दूसरे नेता इनके नेता के सौगुना बेहतर हो। इस प्रकार के मनुष्य किसी भी देश के सम्पूर्ण नागरिक नहीं हो सकते। क्योंकि संपूर्ण नागरिक बनने की प्रक्रिया सवालों से शुरू होकर विद्रोह पर खत्म होती है। सम्पूर्ण नागरिक वो होते हैं जो देशहित में सरकारों से सवाल करे, तर्कशील बनें और स्वविवेक से काम ले, किसी की अधीनता स्वीकार न करे। न तो किसी विचारधारा की, न किसी राजनीतिक दल की। जो असत्य के प्रति विद्रोह करने में सक्षम हो। सम्पूर्ण नागरिक बनने के लिए सवालों की अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है। और ये योग्यताएं इन दोंनो प्रकार के नागरिकों में नहीं है। 
इन दोनों ही प्रकार के नागरिकों को समझना होगा कि इन्होंने देश के असल नागरिकों का जितना सत्यानाश किया है उससे कहीं अधिक इन्होंने देश का भी सत्यानाश किया है। क्योंकि इन्होंने हमेशा अपने आका की कमजोरी को छुपाने में अपनी महती भूमिका निभाई है। इससे असल के मुद्दों पर पर्दा डलता गया और बेवजह के मुद्दों पर बहस होती रही। शायद यही वजह है कि आज रोजगार, कमरतोड़ मंहगाई, पेट्रोल-डीजल के दामों में बेतहाशा वृद्धि, अन्याय अत्याचार, घटती अभिव्यक्ति की आजादी जैसे जरूरी मुद्दों पर बहस नहीं हो रही है। 

स्वतंत्र लेखक - मनीष अहिरवार
Email- mgoliya1@gmail.con

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