Krishna Janmashtami Special. Kanhaiya is called Laddu Gopal, know why and how Krishna got this name
सोमवार, 30 अगस्त (30 August) को दुनियाभर में श्री कृष्ण जन्माष्टमी Krishna Janmashtami का पर्व मनाया जाएगा.
काबुल 29 अगस्त। कुम्भनदास हर समय प्रभु श्री कृष्ण की भक्ति में लीन रहते थे और पूरे नियम से भगवान की सेवा करते थे. वे उन्हें छोड़ कर कहीं नहीं जाते थे, ताकि उनकी सेवा में कोई विघ्न न हो.
इनमें लड्डू गोपाल Laddu Gopal काफी प्रसिद्ध है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान कृष्ण Bhagvan krishna का नाम लड्डू गोपाल कैसे और क्यों पड़ा? दरअसल, ब्रज भूमि में भगवान श्रीकृष्ण के एक परम भक्त रहते थे, उनका नाम था कुम्भनदास. कुम्भनदास का एक पुत्र था- रघुनंदन.
हर वक्त कृष्ण भक्ति Krishna Bhakti में लीन रहते थे कुम्भनदास
कुम्भनदास हर समय प्रभु श्री कृष्ण की भक्ति में लीन रहते थे और पूरे नियम से भगवान की सेवा करते थे. वे उन्हें छोड़ कर कहीं नहीं जाते थे, ताकि उनकी सेवा में कोई विघ्न न हो. एक दिन वृन्दावन से उनके लिए भागवत कथा करने का न्योता आया. पहले तो उन्होंने मना कर दिया लेकिन लोगों के जोर देने पर वे कथा के लिए जाने के लिए तैयार हो गए. उन्होंने सोचा कि भगवान की सेवा की तैयारी करके वे रोजाना कथा करके वापस लौट आएंगे जिससे भगवान का सेवा नियम भी नहीं छूटेगा. उन्होंने अपने पुत्र को समझा दिया कि वे भोग तैयार कर चुके हैं, तुम्हें बस समय पर ठाकुर जी को भोग लगा देना है. कुम्भनदास ने अपने पुत्र रघुनंदन को समझाया और वहां से प्रस्थान कर दिए.
जब बालक का रूप धारण कर भोजन करने आए श्री कृष्ण
रघुनंदन ने भोजन की थाली ठाकुर जी के सामने रखी और सरल मन से आग्रह किया कि ठाकुर जी आओ और भोग लगाओ. उसके बाल मन में यह छवि थी कि वे आकर अपने हाथों से भोजन करेगें, जैसे हम सभी करते हैं. उसने बार-बार ठाकुर जी से आग्रह किया लेकिन भोजन तो वैसे का वैसे ही रखा रहा. अब रघुनंदन उदास हो गया और रोते हुए पुकारा कि ठाकुर जी आओ और भोग लगाओ. जिसके बाद ठाकुर जी ने एक बालक का रूप धारण किया और भोजन करने बैठ गए. ये दृश्य देख रघुनंदन भी प्रसन्न हो गया.
बेटे पर शक करने लगे थे कुम्भनदास जी
रात को जब कुम्भनदास जी ने लौट कर पूछा- बेटा, तुमने ठाकुर जी को भोग लगाया था? रघुनंदन ने कहा- हां. उन्होंने प्रसाद मांगा तो पुत्र ने कहा कि ठाकुर जी ने सारा भोजन खा लिया. उन्होंने सोचा कि बच्चे को भूख लगी होगी तो सारा भोजन उसने ही खा लिया होगा. अब तो ये रोज का नियम हो गया कि कुम्भनदास जी भोजन की थाली लगाकर जाते और रघुनंदन ठाकुर जी को भोग लगाते और जब वे वापस लौटकर प्रसाद मांगते तो एक ही जवाब मिलता कि ठाकुर जी ने सारा भोजन खा लिया. कुम्भनदास जी को अब लगने लगा कि पुत्र झूठ बोलने लगा है.
भगवान को बाल रूप में देख चरणों में आ गिरे थे रघुनंदन के पिता
कुम्भनदास ने एक दिन लड्डू बनाकर थाली में सजा दिए और छिप कर देखने लगे कि बच्चा क्या करता है. रघुनंदन ने रोज की तरह ही ठाकुर जी को पुकारा तो ठाकुर जी बालक के रूप में प्रकट होकर आए और लड्डू खाने लगे. यह देखकर कुम्भनदास जी दौड़ते हुए आए और प्रभु के चरणों में गिरकर विनती करने लगे. उस समय ठाकुर जी के एक हाथ मे लड्डू और दूसरे हाथ वाला लड्डू मुख में जाने को ही था कि वे जड़ हो गए. उसके बाद से ही उनकी इसी रूप में पूजा की जाती है और वे 'लड्डू गोपाल' कहलाए जाने लगे.
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