Dr. Sunilam wrote a letter to display the weapons used in Multai police firing and the pictures of martyr farmers in the Police Museum being built in Ranipur.
Multai News. बैतूल जिले के रानीपुर में बन रहे प्रदेश के पहले पुलिस संग्रहालय में मुलताई पुलिस फायरिंग 1998 में इस्तेमाल किए गए हथियार और शहीद किसानों के चित्र लगवाए जाने के लिए मुलताई के पूर्व विधायक डॉ सुनीलम ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखा है, साथ ही पुलिस विभाग को भी इसकी प्रतिलिपि भेजी है। उन्होंने पत्र में लिखा है कि "मेरी जानकारी में आया है कि मध्यप्रदेश पुलिस द्वारा मध्यप्रदेश में पहला पुलिस थाना स्थापित किए जाने के 121 साल पूरे होने के अवसर पर बैतूल जिले के रानीपुर थाने के पुराने भवन को पुलिस म्यूजियम (संग्रहालय) बनाया जा रहा है। अखबारों से प्राप्त सूचना के अनुसार संग्रहालय में पुलिस की शहादत के अलावा आदिवासियों के आंदोलनों, सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में ब्रिटिश शासन द्वारा आदिवासियों पर हुए अत्याचारों को दर्शाया जाएगा.
आपसे अनुरोध है कि इस संग्रहालय में 12 जनवरी 1998 को पुलिस गोली चालन में शहीद हुए किसानों के चित्र और पुलिस द्वारा इस्तेमाल की गई बंदूकों को भी प्रदर्शित करने का निर्देश दें ताकि आने वाली पीढ़ीयों को भी मालूम चल सके कि स्वतंत्र भारत में पुलिस दमन समाप्त नहीं हुआ है तथा पुलिस व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है।
दुनिया में संग्रहालय ,सत्ता और सरकारों से प्रभावित नहीं होते तथा केवल इतिहास बतलाने का काम करते हैं। यह संग्रहालय क्योंकि बैतूल जिले में बनाया जा रहा है इसलिए मैंने मुलताई गोली चालन का जिक्र किया है। यदि प्रदेश स्तर पर बनाया जाता है तो उसमें कम से कम मध्यप्रदेश में अंग्रेजों के जाने के बाद हुए गोली चालनों की सूची प्रदर्शित की जानी चाहिए तथा मंदसौर पुलिस गोली चालन में शहीद हुए 6 किसानों की तस्वीरें भी प्रदर्शित की जानी चाहिए।
जहां तक बैतूल जिले के किसानों और आदिवासियों के आजादी के आंदोलन में योगदान का मुद्दा है। यह बैतूल जिले और मध्यप्रदेश के आदिवासियों की स्वर्णिम सँघर्ष गाथा है ।
जिसमें रमखो बाई जैसी वीरांगना को सर्वोच्च स्थान दिया जाना चाहिए, जिन्होंने जंगल सत्याग्रह के दौरान अंग्रेजों के दांत खट्टे किए थे तथा उन पर अंग्रेजों ने हत्या तक के आरोप लगाए थे।
मैं 1985 में रामखो बाई, विष्णु सिंग, मोकम सिंग, जंगु सिंग और जंगल सत्याग्रह की प्रेरणा से ही बैतूल जिले में पहली बार बंजारी ढाल पहुंचा था।
शाहपुर से लेकर पट्टन तक 1942 में बैतूल जिले के आदिवासियों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था। संग्रहालय अतिआवश्यक है। इसके साथ बैतूल के आज़ादी के आंदोलन के इतिहास को भी कम से कम बैतूल जिले के स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाने की व्यवस्था मध्यप्रदेश शासन द्वारा सुनिश्चित की जानी चाहिए।
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