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केन्द्र सरकार के दूसरे फर्जी राहत पैकेज ने किसानों को कर्जदार और प्रवासी मजदूरों को असहाय छोड़ा - डॉ सुनीलम।



मुलताई । किसान संघर्ष समिति के कार्यकारी अध्य्क्ष पूर्व विधायक डॉ सुनीलम ने कहा है कि मोदी सरकार की हाल की घोषणा इस बात की स्वीकरोक्ति है कि वह किसानों और मेहनतकश जनता की समस्याओं के लिए कछ नहीं करेगी।
          देश भर के किसान सरकार द्वारा उसके हितों का ख्याल न रखने और लगातार उसकी पीड़ा बढ़ते रहने के विरोध में कल सुबह 9 बजे देश के हर गांव में ‘किसान सम्मान दिवस’ मनाएंगे। मोदी सरकार द्वारा रबी फसल की कटाई के महत्वपूर्ण समय पर व्यर्थ ही ग्रामीण भारत का भी लाॅकडाउन किए जाने के बावजूद किसानों ने बुरे हालातों में कड़ी मेहनत की और अपने को देश के खाद्यान्न योद्धा साबित करते हुए भोजन की सुरक्षा की गारंटी की।
          कोविड के प्रसार को रोकने के लिए ग्रामीण भारत और खेतों को लाॅकडाउन करने का कोई वैज्ञानिक कारण नहीं था क्योंकि कोरोना वायरस से बचने के लिए सबसे बेहतरीन जगह खुले हवादार स्थान होते हैं। केवल मास्क और दूरी बनाए रखने आदि महत्वपूर्ण सुरक्षात्मक कदमों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए था और शुरु में जब फसल अपने अंतिम नाजुक हालात में थी तथा कटाई होनी थी, ऐसा नहीं किया गया। 
           किसान व मजदूर यह भी मांग करेंगे कि उनके सभी कर्ज माफ किए जाएं पुराना केसीसी कर्ज समाप्त किया जाए और बिना ब्याज का नया खरीफ का केसीसी कर्ज जारी किया जाए। 
          मेहनतकश किसान यह भी मांग करेंगे कि जब सरकार ने हवाई जहाज के ईंधन, एयर टर्बाइन फ्यूल का दाम घटा कर 22.54 रु0 प्रति लीटर किया है तो डीजल का दाम घटा कर 22 रु0 लीटर किया जाए।
             कल की 2 लाख करोड़ रुपये की 2.5 करोड़ किसानों के लिए राहत योजना, जिसमें 2 फीसदी ब्याज में राहत दी गयी है, वास्तव में केवल 4000 करोड़ रुपए की है (2 लाख करोड़ का 2 फीसदी), 2 लाख करोड़ रुपये की नही। यह स्पष्ट नहीं है कि इसमें जो 2 फीसदी की ब्याज कटौती घोषित की है वह पुरानी 3 फीसदी ब्याज कटौती के अतिरिक्त है या उसके स्थान पर है। यद्यपि सरकार ने कारपोरेटों के 68,607 करोड़ रुपये माफ किये हैं वे किसानों की मदद के लिए राजी नहीं है। उसने 30,000 करोड़ रुपये पूंजीगत निवेश के लिए किसानों को दिये हैं जो प्रति कल्टिवेटर 2,542 रु0 पड़ता है। यह सब जुमला अर्थशास्त्र है क्योंकि ज्यादातर फंड पुरानी कल्याण योजनाओं से है और कर्ज का हिस्सा आरबीआई की मौद्रीक सरलीकरण नीति से जुड़ी है, जिसे कोई भी देश कभी भी लोगों को राहत के कोष में नहीं गिनता। 

सरकार ने अन्तर्राज्यीय प्रवासी मजदूरों का घोर अपमान करते हुए प्रति माह उन्हें 5 किलो अनाज देने की घोषणा की है जबकि आईसीएमआर तक का कहना है कि एक औसत वयस्क व्यक्ति को कम से कम 14.7 किलो की आवश्यकता होती है। अगले दो माह के लिए 8 करोड़ प्रवासी मजदूरों के लिए सरकार ने 3500 करोड़ रुपये आवंटित किये हैं जो प्रति व्यक्ति केवल 437 रु0 बैठता है, यानी दो महीने की मनरेगा मजदूरी यानी 1 माह में 1 दिन की। मोदी जी ने वाइब्रेन्ट जनसांख्यिकी की चर्चा की जो वास्तव में देश के सभी राजमार्गों व रेलवे ट्रैकों पर चलते हुए आते रहे हैं पर उनके कदमों की कम्पन से मोदी सरकार तनिक भी संवेदनशील नहीं हुई और उनकी पीड़ा को हल करने के लिए उसने कुछ नहीं किया है।

सरकार की एक देश एक राशन कार्ड योजना आज की तारीख में न तो राहत देने के काम आएगी, ना ही राष्ट्र के विकास में। 

एमएसएमई के लिए घोषित लोन वास्तव में नीरव मोदी कर्ज योजना जैसी है। 30 फीसदी एमएसएमई फर्जी हैं। जब इनसे कोई कोलैटरल सुरक्षा नहीं ली जाएगी तो इनसे पैसा वापस मिलने की कोई सम्भावना भी नहीं रहेगी। एमएसएमई को जिन्दा करना, खासतौर से ग्रामांचल में, वह भी भारतवासियों की मिल्कियत में, जिसमें कोई कारपोरेट नियंत्रण न हो, देश के ग्रामीण इलाकों में जीवन बचाने और उसका विकास करने के लिए एक निर्णायक कदम होगा। सरकार को उनके भी कर्ज, टैक्स व बिजली के बोझ को और आयात से मिल रही उन्हें प्रतिस्पर्धा को कम करना चाहिए तथा ‘लोकल’ भारतवासियों की क्रय क्षमता बढ़ानी चाहिए। सरकार को ‘मेक इन इंडिया’ से ‘मेक फाॅर भारतवासी’ की ओर बढ़ना चाहिए।

सरकार को ऐसे कदम घोषित करने चाहिए जिससे गावों में जन कल्याण की परियोजनाएं बढ़ें ताकि ग्रामीण भारत का उत्थान हो और रोजगार विकसित हो तथा ग्रामीण जनता की क्रय क्षमता बढ़े। वैश्विक आपूर्ति कम्पनियों को बढ़ावा देने तथा खाद्यान्न प्रसंस्करण तथा फुटकर व्यापार में बड़े कारपोरेट व विदेशी कम्पनियों का प्रवेश कराने से किसान व मजदूरों का संकट बढ़ेगा और वे उखड़ जाएंगे।

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