विश्व स्वास्थ्य संगठन (who) के पहले महानिदेशक ब्रॉक चिशहोम, जो कि एक मनोरोग चिकित्सक भी थे, की प्रसिद्ध उक्ति है : ‘बगैर मानसिक स्वास्थ्य के, सच्चा शारीरिक स्वास्थ्य नहीं हो सकता है.’
उनके ये शब्द इस विचार का समर्थन करते हैं,”मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य बुनियादी तौर पर और अभिन्न रूप से आपस में जुड़े हुए हैं. ,”
ऐतिहासिक रूप से संक्रमणकारी महामारियां आम लोगों में चिंता और घबराहट को बड़े पैमाने पर बढ़ाती हैं.इस तनाव का असर शरीर, दिमाग़, भावनाओं और व्यवहार पर पड़ता है. हर किसी पर इसका अलग-अलग असर होता है.
नया रोग अपनी प्रकृति में अपरिचित होता है और इसके परिणामों के बारे में कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता है. साथ ही यह अगोचर या अदृश्य होता है. इसकी ये सब खासियतें इसे गंभीर चिंता का स्रोत बना देती हैं. हालांकि महामारी के फैलने के दौरान इन प्रतिक्रियाओं को उस समय की स्थिति के हिसाब से आनुपातिक माना जाता है और उन्हें जागरूकता फैलाने का माध्यम माना गया. लेकिन सोशल मीडिया पर आने वाली इन टीपों ने लोगों के बीच डर और तनाव की ‘लपट भड़काने’ का काम किया.ख़ुद को मानसिक रूप से मज़बूत करना ज़रूरी है. आपको ध्यान रखना है कि अपने रिश्तों को मज़बूत करें. छोटी-छोटी बातों का बुरा ना मानें. एक-दूसरे से बातें करें और सदस्यों
का ख़्याल रखें. निगेटिव
बातों पर चर्चा कम करें.घर से बाहर तो नहीं निकल सकते लेकिन, छत
पर, खिड़की
पर, बालकनी
या घर के बगीचे में आकर खड़े हों. सूरज की रोशनी से भी हमें अच्छा महसूस होता है.एक महत्वपूर्ण
तरीक़ा ये है कि इस समय का इस्तेमाल
अपनी हॉबी पूरी करने में करें. वो मनपसंद काम जो समय न मिलने के कारण आप ना कर पाए हों. इससे आपको बेहद ख़ुशी मिलेगी जैसे कोई अधूरी इच्छा पूरी हो गई है. नकारात्मकता
से रहें दूर नकारात्मक
बातों से मन विचलित होने लगता है। इसलिए इससे और इस स्वभाव के लोगों से दूर रहें। घर रहे, सुरक्षित
रहे जय हिन्द।।
लेख- प्रमोद सिंह रघुवंशी
संचालक – रघुवंशी कृषि सेवा केंद्र मुल्ताई, जिला बैतूल

