देश की संवैधानिक संस्थाएं सरकार के आगे बौनी क्यों होती का रही है? - मनीष अहिरवार (युवा लेखक)
देश की संवैधानिक संस्थाएं अगर अपने नैतिक कर्तव्यों का निष्ठा के साथ निर्वहन नहीं करेंगी तो यह अधिक समय तक विश्वनीय नहीं रह सकेंगी। और अंततः यह टूट जाएगी, अगर इसमें जवाबदेही तय नहीं हुई तो। देश की संवैधानिक संस्थाएं लोकतंत्र और संविधान की बॉडी होती है। जिन्हें सरकार और मंत्रालय की नीतियों पर निष्पक्ष होकर रिपोर्ट करनी होती है उनका लेखा-जोखा जनता के सामने लाना होता है।
लेकिन पिछले कुछ सालों से देश की संवैधानिक संस्थाओं की जो कार्यप्रणाली रही है वो वाकई चिंता के लायक है। चाहे वह केन्द्रीय वित्त आयोग हो, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (C.A.G) हो, केंद्रीय निर्वाचन आयोग हो या फिर अन्य कोई संस्था हो। जिन संवैधानिक संस्थाओं को महीने दर महीने और साल दर साल सरकार की कार्यप्रणाली की सच्चाई सामने लानी थी, लगता है वो अब सरकार के सामने बेदम हो गई है। और अगर ऐसा नहीं है तो इन संस्थाओं ने सरकार की कार्यशैली पर कितनी रिपोर्टें पेश की है? इस पर बात होनी चाहिए। यहां पर दो बातें चलती चली जा रही है, या तो देश में सब कुछ ठीक चल रहा है, या फिर कुछ भी ठीक नहीं है। ऐसे में सवाल है कि क्या इस देश में सब कुछ ठीक चल रहा है? क्योंकि देश की जो संवैधानिक संस्थाएं है जो कॉन्स्टिट्यूशनल बॉडी है उनमें से कोई ऐसी रिपोर्ट कोई सूचना निकलकर सामने नहीं आ रही है जो मौजूदा भारत सरकार की सच्चाई सामने ला सके। चाहे फिर वह कैग हो या अन्य कोई संस्था। इन संवैधानिक संस्थाओं की चुप्पी इस बात द्योतक साबित हो रही है कि, या तो देश में सब कुछ ठीक चल रहा है या फिर कुछ भी ठीक नहीं है। मौजूदा दौर में केंद्र सरकार की सारी खबरें सारी सूचना या तो विदेशी अखबारों के जरिए सामने आ रही है या अदालतों की फटकार से। तो फिर ऐसे में सवाल उठता है कि हमारे देश की संवैधानिक संस्थाएं आखिर कर क्या रही है? केंद्र सरकार एवं उनके मंत्रालयों की नीतियों की वो तमाम सूचनाएं वो तमाम रिपोर्टस जो इन संवैधानिक संस्थाओं को उजागर करनी थी ये संस्थाएं क्यों सार्वजनिक नहीं कर रही है? जो केंद्रीय मंत्रालयों में होती है? इन संवैधानिक संस्थाओं द्वारा चुप्पी साध लेना सब कुछ ठीक होने की ओर इशारा कर रही है। तो फिर सवाल है कि देश की सर्वोच्च अदालत को क्यों कहना पड़ा कि देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा तो कोर्ट चुप नहीं रह सकती। क्या वाकई देश के नागरिकों के अधिकारों का हनन हो रहा है? संविधान भी इस बात की इजाजत कतई नहीं देता की किसी भी नागरिक के संवैधानिक अधिकारों का हनन हो। फिर सुप्रीम कोर्ट चुप कैसे बैठ सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा कि 2021-22 के बजट में 35 हजार करोड़ रुपए टीकाकरण के लिए रखे थे वो कहाँ है? उनका कितना इस्तेमाल हुआ? सवाल है कि भारत सरकार ने बजट के पैसों से कितनी वैक्सीन आर्डर की है? और राज्यों को कितनी वितरित की है? अदालतों ने सरकारों को हत्यारा तक कह डाला, कोविड की दूसरी लहर से हुई मौतों को नरसंहार तक कह डाला फिर भी देश की संवैधानिक संस्थाओं की नींद नहीं खुली।
क्या ये संस्थाएं बता पाएगी कि कोविड की दूसरी लहर में कितने भारतीयों ने अपनी जान गंवाई है? क्या ये संस्थाएं बता पाएगी कि कोविड की दूसरी लहर में देश में कितने लोगों से उनका रोजगार छिना है?
ये संस्थाएं इतनी जर्जर हो चुकी है कि सरकार द्वारा झूठ का पुलिंदा खड़ा कर दिया गया और इन्हें नजर तक नहीं आया। ये संस्थाएं जर्जर झूठ के साथ और जर्जर हो चली है। एक नेता की ज़िद के पीछे इतने सारे झूठ को सहन करना ठीक नहीं है। कोई और देश होता तो उस अस्पतालों पर जाँच बैठ जाती और ईमानदारी से एक-एक मौत का ऑडिट किया जाता। लेकिन यहाँ झूठ के साथ चिपके रहने के बहाने ढूँढे जा रहे हैं। किसी भी जीवित समाज के लिए इस तरह के झूठ को बर्दाश्त करना अपमानजनक है। यह झूठ का पुलिंदा एक इस देश की संवैधानिक बुनियाद और हम सबको खोखला कर देगा।
स्वतंत्र लेखक - मनीष अहिरवार
ईमेल- mgoliya1@gmail.com
Why have the #constitutional #institutions of the #country been dwarfed before the government? Manish Ahirwar (#Young#Writer)

