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आदिवासियों को संविधान में अधिकार देने की क्यो जरूरत पड़ी, St श्रेणी बनाने की जरूरत क्यों पड़ी, 5वी, 6वी अनुसूची और धारा 371 क्यो जोड़ी गयी - जुन्नारदेव जनपद सदस्य दिनेश धुर्वे


हिरदागढ़ से हमदर्द न्यूज के लिए अशोक आरसे की खबर

आदिवासयियो को आरक्षण कोई भीख में नही दिया गया । इसके बदले में आदिवासयियो से उनकी रियासते, क्षेत्र और स्वातयता ली गई है। उन रियासतो और क्षेत्रो से सरकार को जो आय होती है, उस आय की मुठ्ठीभर  आय ही आदिवासियों पर खर्च की जाती है। 
मारँग गोमके “जयपाल सिंह मुण्डा” ने संविधान प्रस्तावना के वक्त उस बड़ी बहस में पूरे संविधान सभा में कहा था – “आप आदिवासियों को लोकतंत्र के बारे में नहीं सिखा सकते, आपको लोकतांत्रिक तरीका उनसे सीखना पड़ेगा। वे इस पृथ्वी के सबसे ज़्यादा लोकतांत्रिक लोग हैं।" 
मुसलमानों के समय भी आदिवासयियो की अपनी स्वतंत्र राज्य, रियासते मौजूद थी, अंग्रेजो के समय भी आदिवासी राज्य और रियासते मौजूद थी। क्रांतिकारी तांत्या टोपे का तो नाम सुना ही होगा, आदिवासी शासक था। ऐसे ही कई रियासते थी। अंग्रेजो का विरोध भी सबसे पहले आदिवासयियो ने ही करना शुरू किया था। कुछ आदिवासी राज्यो को तो अंग्रेजो ने अपने अर्ध नियत्रण में ले लिया था, और बहुत सारे रियासतो पर उनका सीधा नियंत्रण नही था, उनसे केवल टैक्स लिया जाता था। जैसे राजस्थान की राजपूत रियासतो से लिया जाता था, वैसा ही।  जब भारत आजाद हुआ उस समय आदिवासी रियासतो और आदिवासी बहुल क्षेत्रो को तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने कह दिया था कि चाहे तो वे स्वतंत्र रह सकते है या भारत पाकिस्तान में शामिल हो सकते है। संविधान सभा मे आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा ने और कई आदिवासी नेताओ ने कह दिया था कि  हम हमारा विकास का पैमाना खुद तय कर लेंगे। हमे स्वातयता चाहिये । हम स्वतंत्र रहेंगे। क्योंकि बाहरी लोगों ने हमे आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक रूप से काफी नुकसान पहुचाया है। हमारी संस्कृति, हमारी धार्मिक मान्यताये, हमारी सामाजिक व्यवस्थाएं अन्य लोगो से अलग है। वे इनको नुकसान पहुचाते है। हमारा शोषण करने की कोशिश करते है।  हमे बाहरी हस्तक्षेप नही चाहिए। हम हमारा विकास खुद करने में सक्षम है, बशर्ते कि हमे स्वतंत्र छोड़ दिया जाए। आदिवासयियो ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था। आदिवासी रियासतो को स्वायत्ता और स्वतंत्रता देना भारत के एकीकरण में बाधक था। इसलिए तत्कालीन नेताओ ने भारत के एकीकरण में शामिल होने के बदले में आदिवासी रियासतो और आदिवासयियो को एक तरह से समझौता प्रस्ताव के रूप में आरक्षण का प्रस्ताव दिया। आदिवासी रियासतो और आदिवासी बहुल क्षेत्रो में, आदिवासी संस्कृति, आदिवासी धर्म मान्यताये, आदिवासी सामाजिक व्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए आदिवासी शासन स्थापित करने  और क्षेत्रो का विकास के लिए धनराशि एवं सम्पूर्ण सहयोग देने का तय किया गया । सुरक्षा, संरक्षण, और विकास की गारंटी दी गयी।इसके लिए सविंधान में 5 वी और 6 वी अनुसूचित जोड़ी गयी। आदिवासी समुदायों को चिन्हित कर अनुसूचित जनजाति(ST) की श्रेणी में जोड़ा गया। इस प्रकार st श्रेणी बनी। भारत मे तीन तरह के शासन की स्थापना की गई। धारा 370 के अनुसार कश्मीर का शासन चलेगा,  धारा 371 के अनुसार आदिवासी रियासतो और  बहुल क्षेत्रों का शासन चलेगा, बाकी सम्पूर्ण भारत का "सामान्य कानून व्यवस्था" से शासन चलेगा ।  5 वी अनुसूची में वो आदिवासी  क्षेत्र रखे गए जो आंशिक अंग्रेजी शासन के नियत्रण में था।  6 वी अनुसूचि में वो आदिवासी क्षेत्र रखे गए जो अंग्रेजी शासन के नियंत्रण में नही थे। आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासी स्वशासन के लिए ग्राम सभा को पूरे अधिकार दिए गए। विकास का पैमाना वो ग्राम सभा तय करेगी। उसकी सहमति के बिना, सरकार उस आदिवासी क्षेत्र में सड़क भी नही बना सकती। भारत सरकार आदिवासी क्षेत्र के विकास के लिए धनराशि उपलब्ध कराएगी।  बाकी सम्पूर्ण भारत की शासन प्रणाली आदिवासी क्षेत्र में लागू नही होगी। ये सब अधिकार 5वी और 6वी अनुसूचि में दिए गए। लेकिन अभी तक 5वी और 6वी अनुसूचि को लागू नही किया गया। आदिवासयियो के साथ एक छलावा किया गया। आदिवासी रियासतो और क्षेत्रों को भारत मे शामिल करने के बदले में जो अधिकार दिए गए उसका 10% भी नही मिला। आदिवासयियो से हीरा लेकर खोटे सिक्को से भरा संदूक दिया गया है ।

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