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बक्‍सवाहा के जंगलों में मौजूद है 2-3 हजार वर्ष पुराने शैलचित्र, जंगल काटने से रोककर वहां पर्यटन स्थल विकसित करें शिवराज सरकार - विजया पाठक, एडिटर जगत विजन

thousand years old rock paintings present in the forests of Buxwaha, stop cutting the forest and develop tourist places there Shivraj Sarkar - Vijaya Pathak, Editor Jagat Vision.






बक्‍सवाहा के जंगलों को काटने से रोककर वहां पर्यटन स्थल विकसित करें शिवराज सरकार

यह जंगल हमारी धरोहर है इन्हें काटकर राजस्व बढ़ाना कहां की बुद्दिमानी है

शैलचित्र हमारी अमूल्य धरोहर है इसे सहेजना हमारा पहला कर्तव्य है

विजया पाठक, एडिटर, जगत विजन

       मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले से सटे बक्‍सवाहा में हीरे की खुदाई के लिए करोड़ो पेड़ काटे जाने को लेकर स्थानीय लोगों का संघर्ष अब भी जारी है। आज भी ग्रामीण अपना कामकाज छोड़ दिन भर इधर से उधर जंगल और जमीन बचाने को लेकर संघर्ष कर रहे है। पिछले दिनों मेरा बक्‍सवाहा जाना हुआ। इस दौरान मैंने ग्रामीणों की पीड़ा को करीब से जाना और उनके दर्द की मुख्य वजह को समझा। लगभग 48 घंटे से अधिक समय मैंने उनके साथ बिताया। अपना राजस्व बढ़ाने के उद्देश्य के साथ प्रदेश सरकार हीरे की खुदाई की परमिशन पहले ही बिड़ला समूह को दे चुकी है। लेकिन सरकार इस बात से अब भी अंजान है कि जिस जमीन को वो चंद हीरों की खुदाई के लिए बिड़ला समूह के सुपुर्द कर चुकी हैं वहां असल में उसकी एक महत्वपूर्ण धरोहर भी छुपी है। वह धरोहर है आदिमानव काल के शैलचित्र। यह शैलचित्र आज भी वहां देखने को मिलते है। जो करीब तीस हजार साल पुराने है। इसकी खोज भारतीय पुरात्व विभाग की टीम ने खोज की। यह मामला प्रदेश के हाईकोर्ट के संज्ञान में भी है और उसने भी अपनी रिपोर्ट मे कहा है बक्‍सवाहा के जंगलों में मिलने वाले शैल चित्रों के बारे में अनुमान है कि यह 20000 से 30000 वर्ष पुराने हो सकते हैं। इन शैलचित्रों की जानकारी हाईकोर्ट में आर्कियोलॉजी विभाग ने दी है जिनका दावा है कि यह शैलचित्र आदिमानव की 46 प्रजातियों की मानी जा रही है। यह शैलचित्र रॉक पेंटिंग लाल रंग से चट्टानों मे उखेरे गये है, जिन्हे संरक्षित करने जरूरत है और इन पर पुरातत्व विभाग रिसर्च करने की और जरूरत है। ताकी इन शैलचित्रों को संरक्षित किया जाता है तो इस क्षेत्र में इस रॉक पेंटिंग की वजह से इन जंगलो मे पयर्टन क्षेत्र विकसित कर यहां रोजगार की उम्मीद जगाई जा सकती है। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां एक रॉक पेटिंग लाल रंग की है यह आग की खोज से पहले की बताई गई है। दूसरी पाषाण युग से मध्यकाल के बीच की है, ये लाल रंग और चारकोल से बनाई गई है। तीसरी रॉक पेंटिंग मानव इतिहास को दर्शाती है, जिसमें पहाड़ों और गुफाओं पर युद्ध के चित्र उकेरे गए हैं। मैं सरकार का ध्यान इस विषय पर केंद्रित करना चाहती हूं कि जब भोपाल से सटी हुई जगह भीम बैठिका में शैलचित्र मिलने पर वहां पर्यटन स्थल को विकसित किया जा सकता है तो फिर बक्‍सवाहा के इस स्थान को पर्यटन स्थल के रूप में क्यों विकसित नहीं किया जा सकता। आखिर प्रदेश सरकार राजस्व पर्यटन स्थल को विकसित करके भी प्राप्त कर सकती है। यह शैल चित्र हमारी अमूल्य धरोहर है जिसकी कोई कीमत नहीं। यह कीमत बिड़ला जैसे बिजनेसमैन कभी नहीं चुका पाएंगे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद भी इस पर्यटन को बढ़ावा देने को लेकर संवेदनशील रहते है, ऐसे में उन्हें इस प्रोजेक्ट पर तुरंत रोक लगाकार इस स्थान को भी भीम बैठिका या अन्य पर्यटन स्थल की तरह विकसित करना चाहिए क्योंकि छतरपुर खजुराहो से नजदीक है और यहां अक्सर विदेशी और लोकल पर्यटकों का आना जाना लगा रहता है। इससे न सिर्फ पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार से भी जोड़ा जा सकेगा।

       बक्सवाहा के क्षेत्र में पाषाणकालीन 20 हजार से लेकर 30 हजार वर्ष पुराने शैल चित्र मिले हैं। जटाशंकर में 40 हजार पुराने शैलचित्र मिले है।


प्रोफेसर एस.के.झारी जो पुरातत्व विद है। शासकीय महाराजा कॉलेज छतरपुर में कला विभाग के डीन है। इन्होंने अपने शोध पत्र में इन शैलचित्रों की उम्र बताई है।


जब मैं बक्‍सवाहा गई तब मेरी मुलाकात पर्यावरणविद्, सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर, राजेश यादव, शरद कुमरे, बहादुर आदिवासी से हुई, जिन्‍होंने काफी शैलचित्रों को खोजा और इनको अनुमान है कि शैल चित्रों की लंबी चैन है। इन्‍होंने मुझे सभी शैल चित्र दिखाये और अभी इनकी खोज जारी है।


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