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 गरीबी के छोर से प्रख्यात हुए मिर्ज़ा ! 


 शाकिर शेख की कलम से✍


मध्यप्रदेश के मंदसौर शहर  की गलियों और स्कूल में पढ़ा हुआ शाहरुख मिर्जा अपनी बेबाक पत्रकारिता व बढ़ती बुलंदियों के चलते  पूरे प्रदेश में  नाम से जानेजाने लगे शाहरूख मिर्जा की  जिंदगी के सफर की दास्तान ए हकीकत  पिता आबिद मिर्जा से शुरू हुई पिता  वरिष्ठ पत्रकार के साथ प्रख्यात कवि भी हैं मिर्जा आबिद बैग भी अपने जमाने के वरिष्ठ  पत्रकारों में शुमार हुआ करते थे मिर्जा का जन्म 11 मई 1965 को मंदसौर शहर में हुआ बचपन के पड़ाव से निकलते गरीबी के दौर से जूझते मिर्जा बेग ने अपनी जिंदगी को कामयाब बनाने के लिए  जीवन में संघर्ष की  मानो जड़ी ही लगा दी 1975 मैं अपने जीवन में पत्रकारिता की शुरुआत करते  हुए  सर्वप्रथम  मंदसौर  प्रहरी साप्ताहिक समाचार पत्र में लेखन का कार्य शुरू किया 1975 से 1995 तक का सफर मंदसौर प्रहरी के साथ अखबारों वह  ढेरों  रचनाएं  लिखने में बीता 1995 में दशपुर किरण के नाम से एक नया समाचार पत्र शुरू किया  इसके साथ ही  मिर्जा  बेबाक पत्रकारिता के लिए जाने जाने लगे मिलती कामयाबी बढ़ती प्रतिष्ठा से भलीभांति पूर्ण होते मिर्जा अपने दौर के विख्यात कवि व पत्रकार के रूप में साबित हुए इसी बीच जद्दोजहद वाली जिंदगी में  एक प्रकाश की विशाल किरण   दिखाई दी   जब इंडियन एक्सप्रेस समूह के दैनिक पेपर जनसत्ता में 22 जून 1986 को नई दिल्ली से प्रकाशित संस्करण में इनके द्वारा लिखें आर्टिकल को जगह मिली उस समय प्रभात जोशी जी के प्रख्यात अख़बार जनसत्ता  का देश में बोलबाला  था ! उस आर्टिकल को फिल्मी जगत की दुनिया द्वारा बहुत ही सराया गया हिंदी साहित्य की पहली रचना भावनाओं में बैठे हुए यह सपने कैसे पूरे होंगे!   इस रचना  को अद्भुत ख्याति मिली जहां आज तक 300 से ज्यादा रचनाएं लिख चुके मिर्जा  अपने इस जीवन काल मैं  कहीं टीवी सीरियलों की कहानी भी लिख चुके हैं इनमें से कुछ प्यार की जंग ,बड़ा बाबू ,तेरा मेरा साथ, जिंदगानीया इत्यादि है कहीं दशकों से साहित्य प्रेम का रस लेते हुए कदम आगे बढ़ाते ढेरों रचनाएं लिख दी उस समय अविभाजित मंदसौर जिले के कई दैनिक अखबारों में वह स्थानीय अखबारों में काफी लेख प्रकाशित हुए इसी जिंदगी की जद्दोजहद  के चलते मिर्जा आबिद बैग का विवाह दिसंबर 1987 में किसान पुत्री  शहनाज मिर्जा से हुआ जिंदगी   बीतती  गई और तत्पश्चात  5 मई 1995 को पुत्र रतन का अद्भुत सुख प्राप्त हुआ जिसका नाम शाहरुख मिर्जा रखा गया अपना मानना है कि हर व्यक्ति एक कहानी  लिए हुए होता है आपकी भी एक कहानी है तो मेरी भी है जो मेरे जैसा व्यक्ति  निजी कहानी के बजाय भीड़ में अधिक खोया होता है बाहरहाल वक्त का लोचा शब्द की धार  अनंत है ऐसे में आज के वक्त और जीवन के अनुभव को साझा करना यूं तो फालतू है बावजूद इसके अपन इस बार इस  जगह शाहरूख मिर्जा की जीवनी लिखेंगे उम्मीद एक बहुत ही खूबसूरत शब्द की मार्गदर्शिका है एक विचार स्वरूप यह शब्द व  गतिमान ऊर्जा से भरा पूरा होता है जिसका उपयोग वही कर सकता है जो इस शब्द पर भरोसा रखता है बचपन के आंगन में खिले फूलों की तरह शाहरूख मिर्जा ने जिंदगी में कदम  रखते हुए 3 साल की आयु पूर्ण की   शहर के  यूनिवर्सल पब्लिक स्कूल मंदसौर में पिता द्वारा शाहरुख का दाखिला कराया गया  वही मिर्जा कहीं दोस्तों का सहपाठी बना बचपन के उस दौर में  राजिक छिपा शाहरुख मिर्जा के खासम खास दोस्तों में शुमार थे दादा मिर्जा मोहम्मद बेग ने अपनी जिंदगी श्रमजीवी पत्रकार के रूप में पूर्ण की वही पिता मिर्जा आबिद भी श्रमजीवी  पत्रकारिता को करने में व्यवस्थित रहते हुए  आज भी अपनी कलम को उठाएं हैं मानो  ना मानो शाहरुख मिर्जा को पत्रकारिता की होड़ वंशानुगत ही मिली  वह तीसरी पीढ़ी में पत्रकारिता के शौक को लिए शामिल हुए पढ़ाई लिखाई परिस्थितियों के चलते महाविद्यालय तक नहीं हो  पाई परंतु विरासत में मिले प्रिंट मीडिया के कार्य को करने की कुशलता व महारत  हासिल थी 2013 में व्यवसाय जगत से  जुड़ते  हुए कपड़े का व्यवसाय शुरू किया वही सन 2015 के फरवरी माह में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आई.बी.ए. न्यूज़ नेटवर्क जयपुर में अपना स्थान बनाने में  सफल हुए जिंदगी के रंगमंच पर कहीं तरह के प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अपनी पहचान बनाते हुए जिंदगी के पथ पर मिर्जा आगे बढ़ते रहे अनादी न्यूज़,एफ.एम.न्यूज़ में भी मिर्जा अपनी सेवाएं दे चुके हैं पत्रकारिता से हटकर समाज सेवा का जुनून भी मिर्जा के मनो विचारों में विद्यमान है अंजुमन  कमेटी मंदसौर में  पदाधिकारी के रूप में  एवं समाज सेवा के कार्य में सक्रिय  रहते हुए जीवन व्यतीत करने की एक शैली भी मिर्जा में विद्यमान है हमारा एक अजब संयोग भी मिर्जा के संग हुआ कि वह हमारे ससुराल के रिश्ते से भी साले साहब बनकर  नए रूप में हमसे जुड़ें   मिर्जा के व्यक्तित्व की हमेशा एक बात याद रहती है  हमेशा वह यह कहते हुए मिलते मालिक के भरोसे ! मालिक है ना ऊपर! बस  उनकी यही बात मन को हमेशा गदगद करती रही है

 मेरी  बीवी  नाजिमा खान के द्वारा बार-बार  अपने भाई मिर्जा की तारीफों को दोहराते देख आज हम मिर्जा की संजीदगी वाली जीवनी लिखने  पर विवश हो गए मुझे लिखते लिखते ख्याल आ रहा है की मिर्जा जी पर कौन  एकाएक  भरोसा करें कि वे उनके अखबार को इस सूफीरिज्म जीवन के चलते ज्यादा तवज्जो दे पाएंगे इन्हें क्या अखबार का काम  दे क्या पता मिर्जा जी का फकीरी अंदाज लिए हुए जीवन जहां आजकल के दौर  मैं  हर जगह पैसे कमाने की होड़ होती हो वहां  फकीरी आलम लिए यह पत्रकार क्या करेगा? की सोच विचारों में विद्यमान होती  ही होगी सोचने में बड़ा विचित्र लगता है कि यह फकीर  मैं खुद फकीरी आलम लिए तो शायद अखबार भी फकीरी का आलम लेगा हमारी तो टीम इसी स्वभाव की भरी हुई है सोचते हुए लगता कि पत्रकारिता का अपना पूरा जीवन ही रमता जोगी फकीरों  के बीच ही गुजरेगा इन दिनों मिर्जा महाराज बेरागी से सूफी फकीर की तरह अपनी धुन में रात और दिन लगे रहते हैं इन दिनों जनाब की दिनचर्या ही दोपहर में  एक बजे शुरू होती है इसी बीच शायद ही कोई अखबार पूरा पढ़ते होंगे मेरा मानना है  सूफी  धुनि  रेमाय रमता जोगी क्या करता होगा ? जहां एक और हम पत्रकारों को लुभाने वाली मर्ग- मरीचिका सत्ता की होती है वही जिले  वह प्रदेश के  राजनीतिक गलियारों में  मिर्जा की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर जहां एक और सब हैरान है कि यह शाहरुख मिर्जा कौन है? प्रदेश की राजनीति  के गोर धुरंधर इसको प्रमोट कर रहे हैं  वही मंदसौर वर्तमान विधायक यशपाल सिसोदिया से इनके रिश्ते काफी मधुर  बताए जाते हैं राजनीति के इस गौर चाटुकारिता वाले प्रदेश में अपने अनुभवी विश्लेषण  का समावेश करते हुए राजनीतिक  कवरेज करते दिखाई दिए  मिर्जा ने अपनी साफ-सुथरी छवि व  बेबाक निष्पक्ष पत्रकारिता से मंदसौर में ही नहीं अपितु अपने प्रदेश में भी अपने नाम का  परिचय दे डाला  वही घर व जिंदगी की कशमकश की जिम्मेदारियों  के चलते मिर्जा व्यस्त हो गए बुजुर्गगाने दीन में भी आपको काफी  निस्बत है चिश्तिया कादरिया सिलसिले से भी आपका ताल्लुक पुर नूर है मंदसौर मैं ही  बुजुर्गगाने दिन  हजरत वशीउद्दीन मियां जी सरकार एवं गादी नशीन हजरत वकीलउद्दीन मियां जी सरकार से काफी वाबस्ता है

 जहां एक और  आज के इस युग में  सब से मोहभंग हुआ पड़ा है  उसकी दूसरी ओर मैं भी अपनी पत्रकारिता व दैनिक जिंदगी में लगातार खफा रहता हूं और मुझे वह जानने की फुर्सत नहीं होती है कि दूसरे क्या कर रहे होंगे आज फिर सहयोग हुआ मिर्जा जी के जीवन पर प्रकाश  डालने में व्यस्त हो गए

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